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डाउ सिद्धांत

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डाउ थ्योरी, जिसे डाउ जोन्स थ्योरी के नाम से भी जाना जाता है, टेक्निकल एनालिसिस का एक बहुत अहम हिस्सा है। इस थ्योरी के सिद्धांत व्यापारियों को बाज़ार को बेहतर ढंग से समझने में तो मदद करते ही हैं, साथ ही साथ मूल्य और मात्रा (प्राइस व वॉल्यूम) की चाल को ज्यादा बेहतर और सटीकता से पहचानने में भी मदद करते हैं। इस सिद्धांत को चार्ल्स डाउ द्वारा सालों पहले प्रस्तावित किया गया था, यहाँ तक कि कैन्डलस्टिक चार्ट का आविष्कार भी इसके बाद हुआ था। असल में, डाउ जोन्स सिद्धांत बताता है कि बाज़ार रूझानों पर चलता है। और इस सिद्धांत की मदद से व्यापारियों को बाज़ार के रुझानों को पहचानने की एक अच्छी समझ मिलती है, जिससे वह बेहतर व्यापारिक निर्णय ले सकते हैं।

डाउ थ्योरी के 6 बुनियादी नियम

डाउ जोन्स सिद्धांत एक बहुत आसान कान्सेप्ट है, और इसका पूरा फायदा उठाने के लिए, इसके 6 बुनियादी नियम या सूत्र बताए गए है जो इस प्रकार हैं -

सूत्र 1: बाज़ार सब जानता है

याद है, कुशल बाज़ार की परिकल्पना भी यही सुझाव देती है? इस सिद्धांत के अनुसार, शेयर और सूचकांक की कीमतों में सभी उपलब्ध और ज्ञात जानकारी शामिल होती हैं। इसका मतलब यह हुआ कि कीमतों के रूझान, मिलने वाली नई जानकारी के हिसाब से बदलेंगे। व्यापारी, कीमत में इन उतार-चढ़ाव को देखकर निकट भविष्य में मार्केट की दिशा का पता लगा सकते हैं। 

सूत्र 2: बाज़ार के तीन रुझान हैं

यह डाउ जोन्स सिद्धांत के सबसे लोकप्रिय सूत्रों में से एक है। यह हमें बताता है कि बाज़ार इन तीन मुख्य रुझानों में चलता है:

प्राथमिक रुझान/ प्राइमरी ट्रेंड

ये ट्रेंड बाज़ार में मुख्य मूवमेंट होते हैं जो एक या उससे भी ज्यादा सालों तक रह सकते हैं। आसान भाषा में कहें, तो बाज़ार में सबसे ज्यादा यही ट्रेंड चलता है। यह रुझान निर्धारित करते हैं कि मार्केट बुलिश है या बेयरिश, यानी की बाज़ार ऊपर की ओर बढ़ रहा है या नीचे की ओर गिर रहा है। व्यक्तिगत ट्रेडर, जो रीटेल ट्रेडिंग सेगमेंट का सबसे बड़ा हिस्सा हैं, उनके लिए इन रुझानों के साथ चलना बेहतर माना जाता है बजाय इनके खिलाफ चलने के। 

माध्यमिक रुझान/ सेकेंड्री ट्रेंड

यह रुझान वह प्राइस पैटर्न होते हैं जो प्रमुख प्राथमिक रूझानों के सुधारात्मक बिंदुओं की तरह काम करते हैं। यह रुझान आम-तौर पर तीन सप्ताह से कुछ महीनों तक मार्केट में रहते हैं। और यह प्राइमरी रूझानों की उल्टी दिशा में चलते है। उदाहरण के लिए, एक प्राइमरी बुलिश मार्केट में, आपको कुछ हफ्तों के लिए बेयरिश सेकेंड्री ट्रेंड दिख सकता है, और कुछ समय बाद फिर बुलिश मार्केट ट्रेंड आ जाता है। 

मामूली रुझान/ माइनर ट्रेंड्स

मामूली रुझान, जैसा कि इसके नाम से ही पता चल रहा है, यह बहुत ही कम समय के लिए बाज़ार में आते हैं। अक्सर, यह सिर्फ कुछ घंटों या कुछ दिनों तक रहते हैं। सच बताएँ तो यह रुझान सिर्फ बाज़ार का शोर हैं, और अगर आप मार्केट के ट्रेंड्स पर नज़र बनाए रखते हैं तो यकीन मानिए यह सबसे कम भरोसेमंद पैटर्न हैं। मामूली रुझान, प्राइमरी या सेकेंड्री ट्रेंड्स से उल्टी दिशा में चल सकते हैं।

ऊपर दी गई तस्वीर में, ध्यान दें कि किस तरह जुलाई 2017 से जुलाई 2018 तक बाज़ार का प्राथमिक रूझान अपट्रेंड (9,450 से लगभग 10,800 तक) का है? और फिर बीच-बीच में माइनर ट्रेंड हैं जो ज्यादा से ज्यादा कुछ दिनों या दो सप्ताह तक चलते हैं। सेकेंड्री ट्रेंड, फरवरी 2018 और अप्रैल 2018 के बीच आया, जब बाज़ार प्राथमिक अपट्रेंड के खिलाफ, नीचे की ओर गिरा।

सूत्र 3: बाज़ार के रुझान के तीन चरण हैं

चाहे बाज़ार ऊपर की ओर बढ़ रहा हो या नीचे की ओर गिर रहा हो, हर ट्रेंड को तीन चरणों में विभाजित किया जा सकता है:

  • संचय चरण/ एक्यूमुलेशन फेज़
  • जनभागीदारी चरण/ पब्लिक पार्टिसिपेशन फेज़
  • वितरण चरण/ डिस्ट्रिब्यूशन फेज़

 चलिए, देखते हैं कि इन तीन चरणों के दौरान क्या होता है -

संचय चरण/ एक्यूमुलेशन फेज़

यह चरण आम तौर पर एक सीधी गिरावट या डाउनट्रेंड के ठीक बाद होता है, इस समय कई निवेशक और व्यापारी कीमतें बढ़ने की उम्मीद खो देते हैं। हालांकि इस समय शेयर की वैल्यू, सबसे कम हो जाती है लेकिन फिर भी खरीदार शेयर को खरीदने में संकोच करते हैं। और इसी वजह से शेयर की कीमत लगातार नीचे गिरती ही जाती है।

इस स्थिति में, समझदार संस्थागत निवेशक बाज़ार में एंट्री करते हैं। वह यह बहुत अच्छे से समझते हैं कि इस वक्त शेयर की कीमत बाज़ार में बहुत कम हो चुकी है, और वह कम कीमतों पर शेयर को इकट्ठा करने के लिए काफी लंबे समय तक, नियमित रूप से स्टॉक को बड़ी मात्रा में खरीदना शुरू कर देते हैं। इसी वजह से शेयर का सपोर्ट लेवल बन जाता है, क्योंकि इन समझदार निवेशकों द्वारा शेयर की बड़ी मात्रा में की गई खरीद से डीमांड बढ़ने लगती है और शेयर को ऊपर की और बढ़ने के लिए अहम ज़ोर मिलता है। 

जनभागीदारी चरण/ पब्लिक पार्टिसिपेशन फेज़

इसे प्रतिक्रिया चरण या रिस्पॉन्स फेज़ के रूप में भी जाना जाता है। यह चरण तब आता है जब टेक्निकल ट्रेंड के अनुसार चलने वाले शॉर्ट-टर्म ट्रेडर्स बाज़ार में हो रही गतिविधि पर ध्यान देते हैं और बाज़ार में एंट्री करते हैं। वह शेयरों को खरीदना शुरू करते हैं, जिससे एसेट की कीमत में एकदम से तेज़ी आती है। इस तरह से यहाँ बुलिश ट्रेंड स्थापित हो जाता है और इसी वजह से इस चरण को मार्क-अप चरण भी कहते है। यह बढ़ता हुआ ट्रेंड आमतौर पर काफी तेज़ होता है, इसलिए शुरुआत में आम जनता ट्रेडिंग रैली से बाहर की रह जाती है। 

जल्द ही, मार्केट के बारे में खबर सकारात्मक हो जाती है जिससे और अधिक खरीदार ट्रेडिंग के लिए बाज़ार में आ जाते हैं। विश्लेषकों और शोधकर्ताओं इन हाइ प्राइस ट्रेंड को देखते हैं जिससे आखिर में बाज़ारों में सार्वजनिक भागीदारी और बढ़ जाती है।

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वितरण चरण/ डिस्ट्रिब्यूशन फेज़

मार्क-अप चरण के चरम पर, शेयर की कीमत अपने नए हाइ पॉइंट पर पहुंच जाती है। जैसे-जैसे इन रुझानों की खबर पब्लिक में फैलती है, हर कोई शेयर में निवेश करना शुरू कर देता है। और यहीं समझदार निवेशक फिर से अपना गेम खेलते हैं। संचय चरण में जो हुआ, उससे बिलकुल उलट, संस्थागत निवेशक अपनी होल्डिंग को बेचना शुरू कर देते हैं। और वह ऐसा तब करते हैं जब मार्केट में दूसरे लोग शेयर खरीदने पर अपना फोकस लगाए रखते हैं।

इससे शेयर की सप्लाई लगातार बढ़ती जाती है। और जैसे ही शेयर की कीमत एक निश्चित पॉइंट से आगे बढ़ती है, तो संस्थागत निवेशकों द्वारा बढ़ाई हुई बिकवाली, शेयर की कीमत को उस पॉइंट से आगे बढ़ने से रोकती है, जिससे रेसिस्टेंस लेवल बन जाता है। आखिरकार, बहुत ज्यादा बिकवाली, कीमत को कुछ स्तरों पर स्थिर कर देती है और इसे आगे बढ़ने से रोकती है। और फिर, एक डाउनट्रेंड शुरू होता है, और बाज़ार बियरिश यानी मंदी का हो जाता है। 

ऊपर दी गई तस्वीर पर ध्यान दें, आपने देखा कि जनवरी 2000 से लेकर अगस्त 2001 तक बाज़ार मुख्य रूप से डाउनट्रेंड पर है? फिर, सितंबर 2001 के आसपास, वहाँ एक पैनिक प्राइस एक्शन पॉइंट (शेयरों को घबराकर बहुत जल्दी-जल्दी खरीदना/ बेचना) है जिसके बाद संस्थागत निवेशक आते हैं, जो जनवरी 2002 से मई 2003 के बीच के समय को एक संचय चरण या एक्यूमुलेशन फेज़ बनाता है। ध्यान दें कि इस चरण में कई सपोर्ट लेवल बने हैं।

फिर डिस्ट्रिब्यून फेज़ में, जैसे ही शॉर्ट-टर्म ट्रेडर्स मार्केट में आते हैं, तो इंडेक्स का मूल्य मई 2003 में 900 से जनवरी 2004 में 2000 तक पहुंच जाता है। इस पॉइंट पर, एक रेसिस्टेंस लेवल बनता है क्योंकि संस्थागत निवेशक अपनी होल्डिंग्स को बेचना शुरू कर देते हैं, जिससे वितरण चरण शुरू हो जाता है।

सूत्र 4: सूचकांकों को एक दूसरे की पुष्टि करनी चाहिए

यह पहचानने के लिए कि एक ट्रेंड स्थापित हो गया है, यह ज़रूरी है कि सभी बाज़ार सूचकांक एक दूसरे की पुष्टि करें, या एक दूसरे से मेल खाएं। आसान शब्दों में कहा जाए तो एक सूचकांक की गति को बाज़ार में अन्य सभी सूचकांकों के मूवमेंट से मेल खाना चाहिए। तभी हम कह सकते हैं कि बाज़ार में तेज़ी चल रही है या मंदी चल रही है।

उदाहरण के लिए, मान लें कि CNX NIFTY मुख्य रूप से ऊपर की दिशा में बढ़ रहा है, लेकिन NIFTY 500, CNX NIFTY मिडकैप, और बाज़ार के कई अन्य सूचकांक नीचे की ओर गिर रहे हैं। इस स्थिति में, बाज़ार को बेयरिश के रूप में वर्गीकृत करना सही नहीं होगा, क्योंकि CNX NIFTY बाकियों के बजाय ऊपर की ओर बढ़ रहा है। जब सभी सूचकांक एक ही दिशा में आगे बढ़ते हैं, तो आप डाउ सिद्धांत के अनुसार, ट्रेंड की पहचान कर सकते हैं।

सूत्र 5: ट्रेडिंग वॉल्यूम को प्राइस ट्रेंड की पुष्टि करनी चाहिए

इस सिद्धांत के अनुसार, बाज़ार में किसी भी प्राइमरी ट्रेंड, चाहे वह ऊपर की ओर हो या नीचे की ओर, को व्यापार की मात्रा से मेल खाना चाहिए। इसे स्पष्ट करने के लिए, बाज़ार के एक चरण का उदाहरण लेते हैं जहां कीमतें बढ़ रही हैं। इसे प्राइमरी बुलिश मार्केट के रूप में वर्गीकृत करने के लिए, किमतें बढ़ने के साथ ट्रेडिंग वॉल्यूम में भी बढ़ोतरी होनी चाहिए (क्योंकि यह प्राइमरी ट्रेंड है), और कीमतों के घटने पर ट्रेडिंग वॉल्यूम में भी कमी आनी चाहिए (क्योंकि यह सेकेंड्री ट्रेंड है)। दूसरे शब्दों में, मुख्य कारोबार प्राइमरी अपवर्ड ट्रेंड की दिशा में होना चाहिए ना कि सेकेंड्री डाउनवर्ड ट्रेंड की दिशा में।

अब हम इसका बिलकुल उल्टा उदाहरण लेते है जहां बाज़ार में कीमतें गिर रही है। यहां, इसे मुख्य रूप से बियरिश मार्केट मानने के लिए, कीमतों के नीचे जाने (क्योंकि यह प्राइमरी ट्रेंड है) पर ट्रेडिंग वॉल्यूम में बढ़ोतरी होनी चाहिए और जब कीमतें बढ़ती है तो ट्रेडिंग वॉल्यूम में कमी आनी चाहिए (क्योंकि यह सेकेंड्री ट्रेंड है)। दूसरे शब्दों में, ज्यादातर ट्रेड्स को प्राइमरी डाउनवर्ड ट्रेंड को फॉलो करना चाहिए ना कि सेकेन्डरी अपवर्ड ट्रेंड को।

ऊपर की तस्वीर में देखें, कैसे कीमत गिरने पर भी ट्रेडिंग वॉल्यूम बढ़ रहा है, और कीमत बढ़ने पर वॉल्यूम घटता है? इससे पता चलता है ज्यादातर ट्रेड्स डाउनट्रेंड को फॉलो कर रहे हैं जो बेयरिश मार्केट की ओर इशारा करता है।

सूत्र 6: स्पष्ट रिवर्सल होने तक ट्रेंड जारी रहता है

चार्ल्स डाउ ने जाना कि ट्रेंड रिवर्सल और सेकेंड्री ट्रेंड्स के बीच कोई भी आसानी से भ्रमित हो सकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि यह दोनों ही प्राइमरी ट्रेंड की विपरीत दिशा में चलते हैं। उदाहरण के लिए, मान लें कि बाज़ार अब मुख्य रूप से बेयरिश (नीचे की ओर गिर रहा है) है। एक अस्थायी उछाल, ट्रेंड रिवर्सल की तरह लग सकता है। लेकिन यह सिर्फ एक सेकेंड्री ट्रेंड भी हो सकता है। इसलिए, जैसा कि डाउ थ्योरी कहती है, आपको अस्थायी उछाल के बाद भी मार्केट को बेयरिश मार्केट ही मानना होगा, जब तक कि यह स्पष्ट ना हो जाए कीमत की ये अपवर्ड मूवमेंट स्थापित हो चुकी है। उस स्थिति में, यह ट्रेंड रिवर्सल होगा, जिससे बाज़ार में तेज़ी आएगी।

व्यापारियों के लिए डाउ थ्योरी कैसे उपयोगी है?

डाउ सिद्धांत मुख्य रूप से व्यापारियों को अधिक सटीकता के साथ मार्केट ट्रेंड्स को पहचानने में मदद करता है, ताकि वह संभावित प्राइस एक्शन पॉइंट्स का फायदा उठा सकें। यह व्यापारियों को सावधानी से काम करने और मार्केट ट्रेंड्स के खिलाफ ना जाने में भी मदद करता है। और सबसे अहम, डाउ सिद्धांत बाज़ार के माहौल के अच्छे संकेतक के तौर पर, क्लोज़िंग मूल्य के महत्व पर ज़ोर देता है।

ऐसा इसलिए है क्योंकि ट्रेडिंग-डे के दौरान, कारोबार किसी भी स्तर पर हो सकते हैं। लेकिन जैसे-जैसे दिन का अंत आता है, ज़्यादातर बाज़ार प्रतिभागी ट्रेंड्स के अनुरूप होना चाहेंगे। इस हिसाब से, जब शेयर का समापन मूल्य निर्धारित किया जाता है, वह व्यापारियों की दिन के अंत में दी गई प्रतिक्रिया पर निर्भर करता है। यह आपको इस बारे में बिलकुल सही जानकारी दे सकता है की मार्केट संपूर्ण रूप से किस दिशा में बढ़ रहा है। इन जानकारियों के साथ, आप डाउ जोन्स ट्रेडिंग रणनीतियाँ भी बना सकते हैं जो आपको बिलकुल सही ट्रेडिंग निर्णय लेने में मदद करती हैं।

निष्कर्ष

खैर, यहाँ हम टेक्निकल एनालिसिस के हमारे परिचय को खत्म करते है। अब वित्तीय बाज़ारों के एक विशेष सेगमेंट – डेरिवेटिव सेगमेंट को देखने का समय आ गया है। जैसा कि आपको याद होगा, यहाँ पर ऑपशंस और फ्यूचर्स का कारोबार किया जाता है। वायदा, कॉल विकल्प और पुट ऑप्शन के बारे में जानने के लिए हमारे अगले मॉड्यूल के अध्यायों को देखें।

 अब तक आपने पढ़ा

  • डाउ सिद्धांत के 6 बुनियादी सूत्र हैं।
  • पहले सिद्धांत कहता है कि बाज़ार सब जानता है।
  • दूसरे सिद्धांत कहता है कि बाज़ार में तीन रुझान हैं: प्राथमिक, माध्यमिक और मामूली।
  • तीसरे सिद्धांत कहता है कि बाज़ार के रुझान के तीन चरण हैं: संचय, सार्वजनिक भागीदारी और वितरण।
  • चौथे सिद्धांत के अनुसार, सूचकांकों को एक दूसरे की पुष्टि करनी चाहिए।
  • पांचवें सिद्धांत कहता है कि ट्रेडिंग वॉल्यूम को प्राइस ट्रेंड की पुष्टि करनी चाहिए
  • अंत में, स्पष्ट रिवर्सल होने तक ट्रेंड जारी रहता है
  • डाउ सिद्धांत मुख्य रूप से व्यापारियों को अधिक सटीकता के साथ बाज़ार के रुझानों की पहचान करने में मदद करता है, जिससे वे संभावित प्राइस एक्शन पॉइंट का फायदा उठा सकते हैं।
  • यह व्यापारियों को सावधानी के साथ काम करने और बाज़ार के रुझान के खिलाफ कदम ना उठाने में भी मदद करता है। और सबसे बढ़कर, डाउ सिद्धांत बाज़ार के माहौल के अच्छे संकेतक के तौर पर, क्लोज़िंग मूल्य के महत्व पर ज़ोर देता है
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टिप्पणियाँ (1)

Bikash Roy

19 Feb 2021, 07:47 AM

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