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आईपीओ, दिवाला, विलय और विभाजन

8. गोइंग कंसर्न सिद्धांत और कंपनी का जीवन

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इस अध्याय में हम थोड़ा दार्शनिक होते हुए एक कंपनी के जीवन के संबंध में गहन चर्चा करेंगे। जिस तरह इस पूरी दुनिया में रहने वाले हर व्यक्ति को एक ना एक दिन अपने जीवन के अंत पर आना पड़ता है, ठीक उसी तरह एक कंपनी का भी कभी न कभी अंत संभव है। अंतर सिर्फ इतना है कि किसी कंपनी का अंत आमतौर पर खुद उसके मालिकों द्वारा लिक्विडेशन, विलय या फिर एकीकरण के माध्यम से  किया जाता है।

लेकिन सिर्फ इसलिए कि एक कंपनी के जीवन का अंत संभव है, इसका मतलब यह है कि मालिकों को अपने किसी भी व्यवसाय की गतिविधि को उसके अंत को ध्यान में रखते हुए आयोजित करना चाहिए? बिल्कुल नहीं! जिस तरह आप अपना सारा काम अपने जीवित रहने और भविष्य तक स्वस्थ रहने की धारणा के साथ करते हैं, कंपनियां भी ठीक इसी धारणा के तहत काम करती हैं। वित्तीय दुनिया में इस धारणा को गोइंग कंसर्न सिद्धांत के रूप में जाना जाता है। इस अध्याय में हम इसी पर ध्यान देंगे।    

गोइंग कंसर्न सिद्धांत क्या है?

फाइनेंस पर वापस लौटते हुए, गोइंग कंसर्न एक अकाउंटिंग कॉनसेप्ट है जो मानता है कि कंपनी का व्यवसाय निकट भविष्य में चलता रहेगा। जब तक किसी कंपनी के अपने पूरे कारोबार को बंद करने के भारी सबूत नहीं मिलते, तब तक कंपनी को अपने संचालन जारी रखने और अपने व्यवसाय को चलाने की अनुमति रहती है। 

यह धारणा कंपनी के एकाउंटेंट को भारी खर्चों को स्थगित करने की अनुमति देती है। इन 'स्थगित' खर्चों को लंबे समय तक खाते में रखा जाता है। लंबी अवधि के लिए स्थगित किए गए खर्चों का एक बहुत अच्छा उदाहरण एसेट का विमूल्यन है। चूंकि कंपनी को भविष्य में संचालन करते रहने की उम्मीद है, इसलिए एसेट के विमूल्यन की दर को भी नियमित रूप से बढ़ाकर खर्चों में शामिल किया जाता है। गोइंग कंसर्न का यह सिद्धांत कंपनी के फाइनेंशिल्स पर बड़े प्रभाव या विकृतियों के बिना उसकी स्थिति का सटीक और निष्पक्ष दृष्टिकोण प्रस्तुत करने में मदद करता है।

गोइंग कंसर्न सिद्धांत यह भी मानता है कि कंपनी का व्यवसाय स्थिर है और यह अपने ऋण और अन्य वित्तीय दायित्वों को पूरा करने के लिए पर्याप्त राजस्व इकट्ठा करती है। इस धारणा के विपरीत किसी भी प्रमाण का मतलब होगा कि कंपनी अब गोइंग कंसर्न की धारणा पर काम नहीं कर रही है। कंपनी की गोइंग कंसर्न सिद्धांत पर काम करने की क्षमता का विश्लेषण करने की ज़िम्मेदारी और कर्तव्य का भार ऑडिरों पर होता है।    

गोइंग कंसर्न के रूप में जारी रहने की कंपनी की क्षमता को क्या प्रभावित करता है?

अब जब आप इस धारणा के बारे में जान गए हैं, तो आइए कंपनी के गोइंग कंसर्न के लिए कुछ संभव खतरों पर एक नज़र डालते हैं।

  • कंपनी की वित्तीय स्थिति खराब होना, जैसे साल दर साल घाटा होना
  • बढ़ते कर्ज का दबाव और ऋण भुगतान में चूक होना
  • वर्किंग कैपिटल में भारी कमी
  • महंगी और हानि पहुंचाने वाली लंबी अवधि की प्रतिबद्धताएं 
  • कंपनी के सप्लायरों द्वारा कंपनी को व्यापारिक कर्ज़ा देने से इनकार 
  • कंपनी के खिलाफ बड़े और महंगे मुकदमे दर्ज  होना

बिगड़ती वित्तीय स्थिति और वित्तीय दायित्वों को पूरा करने में असमर्थता गोइंग कंसर्न पर सबसे बड़ा खतरा है।

कंपनी के गोइंग कंसर्न न रह पाने पर क्या होता है?

गोइंग कंसर्न सिद्धांतांतिक तौर पर तो ठीक है, लेकिन वास्तविक जीवन में यह सिद्धांत कैसे लागू होता है? आपको कई कंपनियां याद होंगी जो कभी अस्तित्व में थीं और अब वो मौजूद नहीं हैं। उदाहरण के लिए,  क्या आपको किंगफिशर एयरलाइंस याद है? या सत्यम कंप्यूटर सर्विसेज लिमिटेड? इन कंपनियों का क्या हुआ? क्या अब गोइंग कंसर्न इन पर लागू नहीं होता है? संक्षेप में कहें तो, हां। इन कंपनियों के गंभीर वित्तीय संकट और कानूनी कार्यवाही जैसे असंगत मुद्दों की वजह से अब इन्हें गोइंग कंसर्न के रूप में वर्गीकृत नहीं किया जा सकता है। 

अब यह हमें अगले ज़ाहिर सवाल पर लाता है। कंपनी के गोइंग कंसर्न न रह पाने पर क्या होता है? तो ऐसा होने पर, इन दो चीजों में से एक के होने की संभावना है: 

  1. एक विकल्प यह है कि कंपनी अपनी गोइंग कंसर्न की स्थिति प्रभावित होने के पीछे के कारणों को पहचान कर अपने पैरों पर वापस आने की कोशिश कर सकती है। फिर यह अन्य माध्यमों से समस्या को कम करने की कोशिश कर सकती है। उदाहरण के तौर पर, अगर कोई कंपनी अपने किसी भी बकाया वित्तीय दायित्व को पूरा करने में सक्षम नहीं है , तो वह बकाया राशि को पूरा करने के लिए अन्य पार्टियों से धन उधार ले सकता है। हालांकि,  यह एक अस्थायी समाधान है लेकिन यह कंपनी को एक गोइंग कंसर्न के रूप में पटरी पर लाने में मदद कर सकता है।
  2. या कंपनी पूरी तरह से दिवालिया हो जाती है। ऐसी स्थिति में  कंपनी संभवतः अपने संचालन को बंद कर देगी और अपनी संपत्तियों को लिक्विडेट कर देगी। फिर, कंपनी अपने सभी वित्तीय दायित्वों को पूरा करने और अपने सभी लेनदारों और ऋणों का भुगतान करने के लिए अपने एसेट्स की बिक्री से मिली आय का उपयोग करती है। इन सबके अंत में  कंपनी अस्तित्व में नहीं रहती।   

निष्कर्ष

एक निवेशक के रूप में आपके लिए यह जानना ज़रूरी है कि शोधाक्षम या इनसॉल्वेंसी और दिवालियापन क्या हैं, क्योंकि यह किसी कंपनी में आपके निवेश को प्रभावित कर सकते हैं। हालांकि, ये दोनों कॉन्सेप्ट बहुत महत्वपूर्ण हैं और इसके लिए आपको एक अलग अध्याय की आवश्यकता होगी,  हम अगले अध्याय में उनके बारे में गहराई से जानकारी देंगे।

अब तक आपने पढ़ा

  • किसी कंपनी का अंत आमतौर पर उसके मालिकों द्वारा, लिक्विडेशन, विलय या एकीकरण के माध्यम से स्वेच्छा से किया जाता है।
  • गोइंग कंसर्न  एक अकाउंटिंग सिद्धांत है जिसकी मान्यता है कि व्यवसाय निकट भविष्य में  बना रहेगा।
  • गोइंग कंसर्न किसी भी विशाल प्रभाव या विकृतियों के बिना कंपनी को अपने धन संबंधी अधिक सटीक और निष्पक्ष दृष्टिकोण प्रस्तुत करने की अनुमति देता है।
  • सिद्धांत यह भी मानता है कि कंपनी का व्यवसाय स्थिर है और अपने ऋण और अन्य वित्तीय दायित्वों को पूरा करने के लिए पर्याप्त राजस्व उत्पन्न करता है।
  • छह प्रमुख परिदृश्य हैं जो एक कंपनी के गोइंग कंसर्न की धारणा को खतरे में डाल सकता है:
    • कंपनी की वित्तीय स्थिति खराब होना, जैसे कि साल दर साल घाटा
    • ऋणों के पुनर्भुगतान में चूक और बढ़ते कर्ज का दबाव और 
    • वर्किंग कैपिटल में भारी कमी
    • महंगी और हानि पहुँचाने वाली दीर्घकालिक प्रतिबद्धताएं
    • कंपनी के सप्लायरों द्वारा कंपनी को व्यापारिक क्रेडिट से इनकार 
    • कंपनी के खिलाफ बड़े और महंगे मुकदमे दर्ज
  • जब कोई कंपनी गोइंग कंसर्न धारणा का पालन नहीं कर पाती, तो वह अपनी गोइंग कंसर्न की स्थिति प्रभावित होने के पीछे के कारण को पहचान कर और उसे कम करके अपने पैरों पर वापस आने की कोशिश कर सकती है।
  • या कंपनी पूरी तरह से दिवालिया हो जाती है, ऐसी स्थिति में कंपनी संभवतः अपने संचालन को बंद कर देगी और अपनी संपत्तियों को लिक्विडेट कर देगी।
  • फिर, कंपनी अपने सभी वित्तीय दायित्वों को पूरा करने और अपने सभी लेनदारों और ऋणों का भुगतान करने के लिए अपनी संपत्ति की बिक्री से मिली आय का उपयोग करती है। इन सबके अंत में कंपनी अस्तित्व में नहीं रहती।
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