8. पर्दे के पीछे - शेयर बाज़ारों का बैकेंड

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अपनी पसंदीदा फिल्म के बारे में सोचें। आपको सबसे पहली बात क्या याद आती है? फिल्म का कोई सीन, एक गाना या फिर फिल्म की पूरी कहानी? आपके दिमाग में इनमें से चाहे जो भी बात याद रहे वह फ्रंट एंड है। यह फ्रंट एंड इसलिए है क्योंकि आपने इसे देखा और सुना है। लेकिन अगर आप अगर इससे अलग, थोड़ा गहन विचार करें तो आपको पता चलेगा कि एक ब्लॉकबस्टर फिल्म के बनाने के पीछे काफी मेहनत लगी है, जो सिनेमा के पर्दे पर आपको नहीं दिखते। स्क्रिप्ट लिखने से लेकर वे सभी एक्शन सीन जिनको फिल्माने में पर्दे के पीछे काफी मेहनत की गयी है।

आपकी फिल्म की तरह, जो कि फाइनल प्रोडक्ट होता है, बाज़ारों का फ्रंट एंड भी साफ और सरल होता है। आपके मोबाइल ट्रेडिंग ऐप या आपके वेब आधारित ट्रेडिंग टर्मिनल पर बस कुछ क्लिक के साथ आप बाज़ार में खरीदारी और बिकवाली कर लेते हैं। लेकिन असल में पर्दे के पीछे क्या होता है? इसे अगर सीधे शब्दों में कहा जाए तो आपके ऑर्डर करने से लेकर इसे एग्ज़िक्यूटऔर सैटलमेंट करने तक शेयर बाज़ारों के बैकएंड पर बहुत कुछ चलता रहता है।

शेयर बाज़ारों के बैकएंड के बारे में विस्तार से जानना मज़ेदार है। आपको पता चलेगा कि आपके व्यापार को सुचारु रूप से एग्ज़िक्यूट करने के लिए कितने भागीदार मिलकर काम कर रहे होते हैं। इसमें शामिल पार्टियाँ ना सिर्फ आपके व्यापार के लिए बल्कि एक्सचेंज पर हर दिन होने वाले लाखों लेन-देन के लिए काम करती है। है ना जबरदस्त?

इस मज़ेदार बैकस्टेज यात्रा को शुरू करने से पहले ट्रेडिंग टाइमलाइन के एक उदाहरण को देख लेते हैं। 

जैसे आज आप एक्सचेंज पर अपना ऑर्डर देते हैं। उस ऑर्डर के लिए यह दिन ‘ट्रेड डेट’ के रूप में जाना जाता है। और इसे टी(T)-डे के रूप में दर्शाया जाता है। इसके बाद के दिनों को टी+1 डे, टी+2 डे के तौर पर जाना जाएगा।

आपके शेयर खरीदने की टाइमलाइन 

  • मान लीजिए आज आप एबीसी लिमिटेड का 1 शेयर ₹1000 रुपए में खरीद रहे हैं, मतलब यह टी डे है। 
  • जब आप ऐसा करते हैं तो टी डे पर आपके ट्रेडिंग खाते से ₹1000 की राशि कटती है। 
  • इसके अलावा आप जिस ब्रोकर के माध्यम से व्यापार कर रहे हैं वह भी टी डे के अंत तक आपके लिए एक कॉन्ट्रैक्ट नोट जारी करेगा। इस दस्तावेज़ में आपके द्वारा उस दिन किए गए सभी ट्रेडों की जानकारी होगी।
  • टी+1 डे पर आपके द्वारा टी डे पर किए गए व्यापार की इंटरनल प्रोसेसिंग होगी। 
  • इसके बाद टी+2 डे पर आपके द्वारा टी डे पर खरीदे गए एबीसी लिमिटेड के शेयर्स को आपके डीमेट खाते में जमा किया जाता है। 

आपके शेयर बेचने की टाइमलाइन

  • अब मान लीजिए की आप ₹1000 रुपए में एबीसी लिमिटेड का 1 शेयर बेचते हैं, तो आज का दिन टी डे होगा। 
  • इस व्यापार से पहले आपने अपने डीमेट खाते पर जो शेयर रखा होगा, डिफॉल्ट की संभावना को कम करने के लिए उसे ब्लॉक कर दिया जाता है। 
  • टी+2 डे से पहले शेयर आपके खाते से निकाल कर एक्सचेंज को दे दिया जाता है।
  • टी+2 डे पर आपके ₹1000 रुपए की बिक्री की राशि आपके ट्रेडिंग अकाउंट में डाल दी जाती है। 

शेयर ट्रांसफर में शामिल चरण 

जैसा आपने ऊपर के उदाहरण में देखा, शेयर ट्रांसफर की प्रक्रिया में एग्ज़िक्यूशन, क्लियरेंस और सेटलमेंट तीन चरण बताए गए हैं। 

एग्ज़िक्यूशन

इस चरण में आप जैसा कोई ट्रेडर खरीद या बिक्री का ऑर्डर करता है। इसके बाद स्टॉकब्रोकर उस ऑर्डर की ज़रूरतों को पूरा करता है। यह काम टी डे पर होता है। 

क्लियरेंस

टी+1 डे पर इसकी मंजूरी मिलती है। यहां तीसरी पार्टी जिसे क्लियरिंग हाउस के नाम से जाना जाता है, वह खरीदार को जाने वाले शेयर और विक्रेता को मिलने वाली राशि को सुनिश्चित करता है।

सेटलमेंट

इस चरण के दौरान टी+2 डे पर शेयर खरीदार के डीमेट खाते में जमा हो जाते हैं और विक्रेता के ट्रेडिंग खाते में पैसे का भुगतान किया जाता है। 

क्लियरेंस और सेटलमेंट में शामिल प्रतिभागी  

अब तो आपको ट्रेडिंग बैकेएंड पर होने वाली क्लीयरेंस और सेटलमेंट की पूरी प्रक्रिया के बारे में पता चल गया है, अब आइए जानते हैं इसमें शामिल प्रतिभागियों के बारे में।

क्लीयरिंग कॉरपोरेशन

क्लीयरिंग कॉरपोरेशन ट्रेड की क्लियरेंस और सेटलमेंट की पूरी प्रक्रिया के पीछे की इकाई है। भारत में इस प्रक्रिया के लिए मुख्य रूप से नेशनल सिक्योरिटीज क्लियरिंग कॉरपोरेशन लिमिटेड (एनएससीसीएल) और इंडियन क्लियरिंग कॉरपोरेशन लिमिटेड (आईसीसीएल) जिम्मेदार हैं।  

क्लियरिंग मेंबर्स (संरक्षक)

यह ऐसी संस्थाएं हैं जो संबंधित व्यापारियों के बीच ट्रांसफर किए जाने वाली धनराशि और शेयरों की संख्या की पहचान करते हैं। 

क्लियरिंग बैंक

फंड के सेटलमेंट की प्रक्रिया सिर्फ क्लियरिंग बैंकों के माध्यम से होती है। कस्टोडियन को 13 अधिकृत क्लियरिंग बैंकों में किसी एक में ‘क्लियरिंग खाते’ बनाना ज़रूरी होता है।

डिपोज़िटरीज़

चूंकि हम ‘शेयर बाज़ार के मुख्य खिलाड़ी’ अध्याय में ही डिपोज़िटरीज़ के बारे में जान चुके हैं, आगे बढ़ते हैं क्लियरिंग और सेटलमेंट प्रक्रिया में उनकी भूमिका के बारे में जानने की ओर।क्लियरिंग मेंबर्स को डिपोज़िटरीज़ में एक विशेष खाता बनाए रखना होता है जिसे ‘क्लियरिंग पूल अकाउंट’ कहते हैं। सेटलमेंट के दिन क्लियरिंग मेम्बर संबंधित  सिक्योरिटीज़ को ‘क्लियरिंग पूल अकाउंट’ में ट्रांसफर करते हैं। 

निष्कर्ष

कुल मिलाकर बहुत सारे प्रतिभागी ट्रेडिंग के बैकेंड प्रक्रिया को सुचारु बनाने के लिए एक साथ काम करते हैं। जिसके फलस्वरूप लाखों ट्रेड की क्लियरिंग और सेटलमेंट की जटिल प्रक्रिया हर दिन बड़ी आसानी से हो रही है। यह प्रक्रिया शेयर बाज़ार को कुशलता से काम करने को सुनिश्चित करती है। 

अब तक आपने पढ़ा 

  • आप जिस दिन खरीदने या बेचने का ऑर्डर देते हैं उसे ‘टी डे’ कहा जाता है। उसके बाद के दिनों को टी+1 डे, टी+2 के नाम से जाना जाता है।
  • शेयर ट्रांसफर में एग्ज़िक्यूशन, किल्यरेंस और सेटलमेंट, ये तीन चरण शामिल हैं।
  • एग्ज़िक्यूशन का चरण टी डे पर होता है। इस चरण में आप खरीद या बिक्री का ऑर्डर देते हैं। इसके बाद स्टॉकबब्रोकर इस ऑर्डर की ज़रूरतों को पूरा करता है।
  • क्लियरेंस का चरण टी+1 डे पर होता है। यहाँ तीसरा पक्ष जिन्हें क्लियरिंग हाउस कहा जाता है, वे विक्रेता के पास आने वाली धनराशि और खरीदार के पास जाने वाले शेयर्स की पहचान करते हैं। 
  • निपटान चरण के दौरान टी+2 डे पर शेयर खरीदार के डीमेट खाते पर से पैसे काटे जाते हैं। साथ ही विक्रेता के ट्रेडिंग खाते पर पैसे का भुगतान किया जाता है।  
  • क्लियरेंस और  सेटलमेंट की प्रक्रिया के पीछे कई प्रतिभागी शामिल होते हैं।
  • क्लियरिंग कॉरपोरेशन ट्रेड की क्लियरेंस और  सेटलमेंट प्रक्रिया के पीछे की इकाई है। भारत के प्रमुख क्लियरिंग कॉरपोरेशन जैसे नेशनल सिक्योरिटिज क्लियरिंग कॉरपोरेशन लिमिटेड (एनएससीसीएल) और इंडियन क्लियरिंग कॉरपोरेशन लिमिटेड (आईसीसीएल) हैं।
  • क्लियरिंग मेंबर या कस्टोडियन ऐसी इकाइयां हैं जो संबंधित ट्रेडरों के बीच ट्रासंफर होने वाली राशि और शेयरों की संख्या की पहचान करता है। 
  • फंड के सेटलमेंट की प्रक्रिया सिर्फ क्लियरिंग बैंकों के माध्यम से होती है। कस्टोडियन को 13 अधिकृत क्लियरिंग बैंकों में किसी एक में ‘क्लियरिंग खाते’ बनाना ज़रूरी होता है।  
  • क्लियरिंग मेंबर्स डिपोज़िटरीज़ के पास एक विशेष खाता बनाते हैं जिसे ‘क्लियरिंग पूल अकाउंट’ कहा जाता है।
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