9. डॉव सिद्धांत I

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चार्ल्स एच डॉव, जिनके नाम पर “डॉव जोन्स" वॉल स्ट्रीट इंडेक्स का नाम पड़ा, वो कई सिद्धांतों के जन्मदाता थे और तकनीकी विश्लेषण के सिद्धांतों में उनका अहम योगदान रहा है। आज के तकनीकी विश्लेषण में जो कुछ भी विकसित किया गया है, उसकी नींव उन्होंने ही रखी है। इसलिए  डॉव को "तकनीकी विश्लेषण का पितामह" कहा जाता है।

डॉव थ्योरी के अनुसार बाजार तीन अलग-अलग चरणों से बने होते हैं, जो स्वयं को दोहराते हैं। इन्हें संचय या एक्यूमुलेशन चरण, मार्क अप चरण और वितरण या डिस्ट्रीब्यूशन चरण कहा जाता है।

संचय चरण आमतौर पर बाजार में तेज सेल-ऑफ पीरियड के बाद आता है। बाजारों में तेज सेल-ऑफ ने कई बाजार सहभागियों को निराश किया होगा, जिससे कीमतों में किसी तरह की तेजी की उम्मीद कम हो गई। शेयर की कीमतें निम्नतम स्तर से नीचे गिर गई होंगी लेकिन खरीदार अभी भी डर के कारण खरीदने से हिचकिचाएंगे कि कहीं फिर से सेल-ऑफ ना हो जाए। इसलिए शेयर की कीमत निम्न स्तर पर रह जाती है। और तब ‘स्मार्ट मनी’ बाजार में प्रवेश करते हैं।

मार्क अप चरण के दौरान शेयर की कीमत जल्दी और तेजी से बढ़ती है। मार्क अप चरण की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता स्पीड है। क्योंकि रैली बहुत तेजी से आती है इसलिए ज्यादातर निवेशक इससे छूट जाते हैं। नए निवेशक इस वापसी से मंत्रमुग्ध हो जाते हैं और विश्लेषकों से लेकर जनता तक हर कोई उच्च स्तर की उम्मीद लगाने लगता है।

वितरण चरण में संचय चरण के समान मूल्य विशेषता होती हैं। वितरण चरण में जब भी कीमतें अधिक बढ़ने का प्रयास करती हैं, तो स्मार्ट मनी अपनी होल्डिंग छोड़ देते हैं। समय के साथ, यह एक्शन कई बार दोहराया जाता है और इस तरह रेसिस्टेंस स्तर बन जाता है।

1. बाजार में तीन चालें होती हैं:

  1. "मुख्य चाल/ मेन मूवमेंट" - प्राथमिक चाल या प्रमुख ट्रेंड- एक वर्ष से कम से कई वर्षों तक रह सकता है। यह बुलिश या बेयरिश हो सकती है।
  2. "मीडियम स्विंग"- माध्यमिक प्रतिक्रिया- 10 दिनों से तीन महीने तक रह सकती है और आम तौर पर पिछले मीडियम स्विंग या मुख्य चाल की शुरुआत के बाद प्राथमिक मूल्य परिवर्तन के 33% से 66% तक रिट्रेस होती है।
  3. "शॉर्ट स्विंग" या माइनर मूवमेंट- राय के आधार पर घंटों से एक महीने या उससे अधिक के बीच बदलता रहता है। 

ये तीनों चाल एक साथ हो सकती हैं: उदाहरण के लिए, एक बुलिश प्राइमरी मूवमेंट में एक बेयरिश सेकेंड्री रिएक्शन में एक डेली माइनर मूवमेंट।

2. बाजार-रुझान के तीन चरण हैं

डॉव थ्योरी का दावा है कि प्रमुख बाजार के ट्रेंड में तीन चरण शामिल होते हैं - एक एक्यूमुलेशन चरण (चरण 1), एक  पब्लिक पार्टिसिपेशन/ सार्वजनिक भागीदारी (या अवशोषण) चरण (चरण 2), और एक डिस्ट्रीब्यूशन/ वितरण चरण (चरण 3)। संचय या चरण 1 एक ऐसी अवधि है जब निवेशक को पता है वह सक्रिय रूप से बाजार की आम राय के विपरीत शेयर खरीद रहे हैं। इस चरण के दौरान शेयर की कीमतें बहुत अधिक नहीं बदलती हैं क्योंकि निवेशक जिस शेयर की मांग करते हैं, जिसकी बाजार में बड़े पैमाने पर हो रही है, वो अल्पसंख्यक हैं।  

आखिरकार  बाजार इन समझदार निवेशकों के साथ चलने लगता है और चरण 2 का संकेत देते हुए तेजी से मूल्य परिवर्तन होता है। और यह तब होता है जब ट्रेंड को फॉलो करने वाले और तकनीकी रूप से समझदार अन्य निवेशक बाजार में भाग लेते हैं। यह चरण तब तक जारी रहता है जब तक कि बहुत अटकलबाजी न हो। इस पॉइंट पर समझदार निवेशक अपनी होलेडिंग को ड्रिस्ट्रीब्यूट करने लगते हैं और ये चरण 3 के शुरुआत का संकेत होता है।

3. शेयर बाजार हर खबर को शामिल करता है 

नई जानकारी के मिलते ही ये शेयर की कीमत में शामिल हो जाती है। जैसे ही कुछ समाचार प्रसारित होता है, वैसे ही नई जानकारी के प्रभाव को दिखाते हुए कीमतें बदल जाती हैं। दूसरे शब्दों में  कीमतें सभी निवेशकों/प्रतिभागियों की आशाओं, आशंकाओं और उम्मीदों जैसे सभी सूचनाओं के कुल योग का प्रतिनिधित्व करती हैं।

4. शेयर बाजार औसतों को एक दूसरे की पुष्टि करनी चाहिए

डॉव के समय में  अमेरिका एक बढ़ती औद्योगिक शक्ति था। अमेरिका में जनसंख्या केंद्र थे लेकिन इसके कारखाने पूरे देश में बिखरे हुए थे। इसलिए कारखानों को अपना माल आमतौर पर रेलवे द्वारा बाजार में भेजना पड़ता था। डॉव के शेयर औसत के दो सूचकांक थे: एक औद्योगिक (विनिर्माण) कंपनियों  का और दूसरा रेल कंपनियों का। उनका मानना ​​था कि जब तक रेल सेक्टर के एवरेज में रैली नहीं आती, तब तक औद्योगिक क्षेत्र एक बुलिश मार्केट का अनुभव नहीं कर सकता है। इसी तर्क के अनुसार अगर निर्माताओं का मुनाफा बढ़ रहा है तो वो अधिक उत्पादन कर रहे होंगे। और अगर वे अधिक उत्पादन कर रहे हैं, तो उन्हें उपभोक्ताओं को अधिक माल भेजना चाहिए। इसलिए  निर्माताओं की वास्तविक स्थिति के संकेतों को पहचानने के लिए निवेशकों को बाजार में अपने उत्पादन शिपिंग करने वाली कंपनियों के प्रदर्शन पर नजर रखनी चाहिए। ऐसा करने के लिए उन्हें रेल मार्ग प्रदर्शन पर नजर रखनी होगी। एक स्थिर बुलिश या बेयरिश बाजार में औद्योगिक और रेल एवरेज एक ही दिशा में चलते हैं। अगर वो अलग-अलग दिशा में जाना शुरू करते हैं, तो ये परिवर्तन का संकेत हैं। सीधे शब्दों में कहें तो डॉव सिद्धांत के अनुसार  बुलिश मार्केट से बेयरिश मार्केट का बड़ा रिवर्सल  या इसका विपरीत तब तक नहीं हो सकता जब तक दोनों सूचकांक एक दूसरे से सहमत नहीं होते।

5. ट्रेंड की पुष्टि वॉल्यूम द्वारा होती है

डॉव का मानना ​​था कि वॉल्यूम, प्राइस ट्रेंड की पुष्टि करती है। कम वॉल्यूम पर कीमतों के बढ़ने के पीछे कई अलग-अलग कारण हो सकते हैं। हालांकि डॉव के अनुसार उच्च वॉल्यूम के साथ बाजार में बढ़ोतरी की चाल बाजार के वास्तविक चरित्र का प्रतिनिधित्व करती है। इसके अलावा डॉव ने कहा कि जब बड़ी संख्या में बाजार प्रतिभागी एक विशेष सिक्योरिटी में सक्रिय होते हैं और कीमतें महत्वपूर्ण रूप से एक दिशा में चलती हैं तो  बाजार से उसी दिशा में आगे बढ़ने की उम्मीद की जाती है। उनके अनुसार यह  ट्रेंड के विकसित होने का संकेत है।

6. एक ही ट्रेंड मौजूद रहता है जब तक कि इसके खिलाफ निश्चित संकेत नहीं मिलते

डॉव का मानना ​​था कि "बाजार के शोर" के बावजूद ट्रेंड मौजूद रहते हैं। बाजार अस्थायी रूप से ट्रेंड के विपरीत दिशा में आगे बढ़ सकता है, लेकिन यह जल्द ही लाइन पर आ जाएगा। इन रिवर्सल के दौरान ट्रेंड को संदेह का लाभ दिया जाना चाहिए। यह निर्धारित करना कि क्या रिवर्सल एक नए ट्रेंड की शुरुआत का संकेत दे रहा है या मौजूदा चलन में सिर्फ एक अस्थायी हलचल है, आसान नहीं है। इस विचार पर डॉव सिद्धांतकार अक्सर असहमत होते हैं। तकनीकी विश्लेषण उपकरण इसे स्पष्ट करने का प्रयास करते हैं लेकिन अलग-अलग निवेशकों द्वारा उनकी अलग-अलग व्याख्या की जा सकती है।

डॉव "ट्रेंड" को उस दिशा के रूप में परिभाषित करता है जिसमें बाजार चलता है। और इसे तीन वर्गों में बांटा जा सकता है:

  1. अपट्रेंड
  2. डाउनट्रेंड
  3. साइडवे ट्रेंड

अपट्रेंड में शेयर की कीमतें ऊपर की दिशा में बढ़ती चलती हैं, जिससे कीमतें नई ऊंचाई को छूती हैं। इस प्रकार अपट्रेंड का सबसे बेहतर संकेत यह है कि कीमतें  उच्च बिंदु के आसपास रहती हैं।

एक डाउनट्रेंड  में शेयर की कीमतें नीचे की दिशा में गिरती जाती हैं, जिससे कीमतें और भी नीचे चली जाती हैं। इसलिए डाउनट्रेंड का सबसे बेहतर संकेत ये है कि कीमतें निम्नतम पॉइंट बनाती हैं।

ट्रेंड के लक्षण

मौजूदा ट्रेंड

संकेत

एक्शन

उच्च टॉप -उच्च बॉटम

सकारात्मक

खरीदने के लिए गिरावट की प्रतीक्षा करें

निम्न टॉप- निम्न बॉटम

नकारात्मक

बिक्री के लिए वृद्धि की प्रतीक्षा करें

उच्च टॉप- निम्न बॉटम

सावधान

ट्रेंड में परिवर्तन की संभावना

निम्न टॉप- उच्च बॉटम

सावधान

ट्रेंड में परिवर्तन की संभावना

अगर कोई शेयर उच्च वॉल्यूम पर बढ़ना शुरू करता है तो बढ़ोतरी बरकरार रहने की संभावना अधिक होती है। इसलिए अगर आप वॉल्यूम में अहम बढ़ोतरी पर, अहम बॉटम पर कीमत में एक बढ़ा चढ़ाव देखते हैं तो आपको लॉन्ग पोजीशन रखनी चाहिए।  आपको पिछले पांच से आठ सत्रों की औसत वॉल्यूम लेनी होगी, क्योंकि सिर्फ एक सत्र की वॉल्यूम पर ध्यान देने पर संकेत गलत हो सकते हैं।

महत्वपूर्ण बॉटम और ब्रेकआउट पर उच्च वॉल्यूम आमतौर पर ट्रेंड का संकेत देती है। हालांकि एक शेयर कम ऊँचे वॉल्यूम पर गिर सकता है और इसलिए महत्वपूर्ण मार्केट टॉप पर, आप केवल वॉल्यूम पर निर्भर नहीं रह सकते हैं। इसके अलावा कई बार एक शेयर सर्किट हिट कर देता है और ट्रेडिंग बंद हो जाती है।  ऐसे मामले में आपको वॉल्यूम सही संकेत देने में असमर्थ भी हो सकती है।

निष्कर्ष

अब जब आप डॉव सिद्धांत के मूल ज्ञान को समझ गए हैं तो अब हम इस सिद्धांत को लागू करने के बारे में विस्तार से समझते हैं। ये जानने के लिए अगले अध्याय की ओर चलें।  

अब तक आपने पढ़ा

- डॉव थ्योरी एक तकनीकी ढांचा है जो बाजार के बारे में भविष्यवाणी करता है कि अगर इसकी कोई एक एवरेज किसी पिछली अहम ऊंचाई से आगे जाती है और इसकी के साथ अन्य औसतें भी बढ़त की ओर जाती हैं, तो यह अपट्रेंड की ओर बढ़ रहा है ।

- यह सिद्धांत इस धारणा पर आधारित है कि बाजार सब कुछ जानता है और सभी बाजार परिकल्पनाओं के साथ सही बैठता है। 

- इस तरह की स्थिति में, विभिन्न बाजार सूचकांकों को प्राइस एक्शन और वॉल्यूम पैटर्न के संदर्भ में एक-दूसरे की पुष्टि करनी चाहिए जब तक कि ट्रेंड रिवर्सल न हो जाए।

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