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विभिन्न प्रकार के शेयर और खुदरा निवेशकों को क्यों ध्यान रखना चाहिए?

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अभी तक हम सिर्फ इक्विटी शेयर की ही बात कर रहे थे। हालांकि, इक्विटी शेयर ही एकमात्र शेयर नहीं है जिन्हें भारत में रजिस्टर्ड कंपनी द्वारा इश्यू किया जाता है। आप इस बारे में और ज्यादा जानना चाहते है? इस अध्याय में हम लोग अलग-अलग प्रकार के शेयरों, उनके महत्व, और उनसे जुड़े अधिकारों को जानेंगे। तो बिना किसी देरी के, चलिए, शुरू करते है। 

भारत में कंपनियों द्वारा जारी किए जाने वाले विभिन्न प्रकार के शेयर

कंपनी अधिनियम, 2013 के प्रावधानों के अनुसार, भारत में पंजीकृत कोई भी कंपनी दो प्राथमिक प्रकार के शेयर इश्यू कर सकती है– इक्विटी शेयर व प्रेफरेंस शेयर। इन दोनों प्रकार के शेयरों की बहुत से उप-वर्ग और अलग-अलग प्रकार हैं, जिनके बारे में हम इस अध्याय के अगले सेक्शन मे पढ़ेंगे। चूंकि आप पहले से ही इक्विटी शेयर के बारे में जानते है, इसलिए हम सबसे पहले उन्हीं से शुरूआत करेंगे।

इक्विटी शेयर

इन्हें साधारण या ऑडिनरी शेयर के नाम से भी जाना जाता है, इक्विटी शेयर एक कंपनी के स्वामित्व यानी मालिकाना हक को दर्शाते हैं। शायद इसीलिए इक्विटी शेयरों के इश्यू से मिलने वाले फंडस को ओनर्स फंड्स या मालिक के फंड्स के रूप में जाना जाता है। जिन लोगों ने किसी कंपनी के इक्विटी शेयर खरीद रखे होते हैं, उन्हें आमतौर पर इक्विटी शेयरहोल्डर कहते है।

इक्विटी शेयर में वोटिंग का अधिकार होता है जिससे शेयरधारक कंपनी की जनरल मीटिंग का हिस्सा बन सकते हैं और बिज़नेस के निर्णयों को लेने के लिए वोट कर सकते है। क्योंकि इक्विटी शेयरधारक को कंपनी का मालिक माना जाता है, इसलिए उन्हें डिविडेंड भी मिलता है, जो कंपनी द्वारा कमाए गए मुनाफ़े का वितरण है। इसके अलावा, इक्विटी शेयर भी कंपनी पर रेसिडुयल क्लेम के साथ आते है, जिसकी चर्चा हम स्मार्ट मनी के पिछले मॉड्यूल में कर चुके है।  

हालांकि इन सबके बाद भी, इक्विटी शेयर में कुछ कमियाँ भी है। इक्विटी शेयरधारक को डिविडेंड कितना मिलेगा यह निर्धारित नहीं होता है। यह एक निश्चित अवधि के दौरान कंपनी के कमाए गए मुनाफ़े पर निर्भर करता है। इसीलिए कंपनी अगर उस अवधि में अच्छा प्रदर्शन नहीं करती है तो इक्विटी शेयरधारक को डिविडेंड मिलता ही नहीं है और मिलता है तो बहुत कम दर पर मिलता है। रेसिडुअल क्लेम की वजह से, इक्विटी शेयरधारक कंपनी के लिक्विडेशन के समय भी भुगतान की सूची में आखिरी नंबर पर आते हैं।  

डाइल्यूटिव शेयर

आपने स्मार्ट मनी के पुराने मॉड्यूल में हिंदुस्तान यूनिलीवर लिमिटेड की प्रॉफ़िट और लॉस स्टेटमेंट का एनालिसिस करते समय, एक लाइन आइटम ‘प्रति शेयर आय- डाइल्यूटेड’ देखा होगा। डाइल्यूटिव शेयर एक तरह से इक्विटी शेयर ही होते हैं बस उन्हें अलग तरह से वर्गीकृत किया जाता है। अब सवाल यह है कि इन शेयरों को डाइल्यूटिव शेयर के नाम से क्यों बुलाया जाता है?

एक कंपनी, अपने व्यवसाय के दौरान, कर्मचारी स्टॉक विकल्प योजना (इम्प्लॉई स्टॉक ऑपशन प्लान/ ESOP), स्टॉक वारंट, कंवर्टिबल डिबेंचर या यहां तक ​​कि कंवर्टिबल प्रेफरेंस शेयर जैसी सिक्योरिटीज़ भी जारी कर सकती है। यह जारी की गयी सिक्योरिटीज़ एक विशेष प्रावधान के साथ आती है, जो धारक को इन सिक्योरिटीज़ को पूर्व निर्धारित तिथि पर कंपनी के इक्विटी शेयर में बदलने की सुविधा देता है। 

जब कोई होल्डर इस प्रावधान को काम में लेता है और इन सिक्योरिटीज़ को पूर्व निर्धारित तिथि पर इक्विटी शेयरों में बदलता है तो कंपनी के बकाया शेयरों की संख्या बढ़ जाती है। शेयरों के एकदम से बढ़ जाने से, प्रति शेयर आय (EPS) के मूल्य में कमी आ जाएगी? है ना। यही कारण है कि इन सिक्योरिटीज़ को डाइल्यूटिव सिक्योरिटीस या डाइल्यूटेड शेयर के नाम से जाना जाता है।  

चूंकि यह सिक्योरिटीज़, शेयरों में बदलने पर EPS को डाइल्यूट यानी कम करने की क्षमता रखती है, इसलिए कंपनी अपने प्रॉफ़िट और लॉस स्टेटमेंट के 'अर्निंग पर शेयर' सेक्शन के तहत इसे शामिल करके इसके प्रभाव का हिसाब रखती है।

डाइल्यूटिव शेयरधारक के पास वह सभी अधिकार और फायदे होते हैं जो इक्विटी शेयरधारक के पास होते है।

डिफ़्रेंशियल वोटिंग राइट्स वाले इक्विटी शेयर (DVR)

अब, ये एक विशेष प्रकार के इक्विटी शेयर हैं। डिफरेंशियल वोटिंग राइट्स शेयर (DVR) वैसे तो काफी हद तक इक्विटी शेयर के समान ही होते हैं पर इनमें कुछ अंतर भी होता है।

सबसे पहला अंतर वोटिंग के अधिकार में आता है। आम इक्विटी शेयरों में वोटिंग रेशियो 1:1 होता है। इसका मतलब यह हुआ कि एक शेयरहोल्डर, एक शेयर पर एक वोट के हिसाब से वोटिंग कर सकता है। जैसे, अगर आपके पास किसी कंपनी के 100 इक्विटी शेयर हैं तो आपको 100 वोट डालने का हक है। लेकिन DVR वाले इक्विटी शेयर्स के पास वोटिंग अधिकार कुछ कम होता है। कंपनी के नियम और कायदों के हिसाब से, अगर आपके पास DVR वाले इक्विटी शेयर हैं तो आप बिज़नेस के कुछ फैसलों पर वोटिंग नहीं कर सकते है या आपकी वोटिंग पावर में कमी आ जाएगी। वैसे आमतौर पर, कंपनियाँ बाद वाले ऑप्शन को चुनती है और DVR वाले इक्विटी शेयरधारक की वोटिंग पावर को कम कर देती हैं। ज़्यादातर ऐसे शेयरों की वोटिंग पावर 10:1 तक कम हो जाती है, इसका मतलब यह हुआ कि अगर आपके पास DVR वाले 10 इक्विटी शेयर हैं, तो आपको उन सब के लिए सिर्फ 1 ही वोट करने को मिलेगा।

तो अगर ऐसा है तो DVR शेयरधारक को तो नुकसान उठाना पड़ेगा, क्यों सही कहा ना? तो ऐसे शेयर्स को कौन खरीदना चाहेगा और क्या उन्हें अपने वोटिंग राइट छोड़ने के बदले में कुछ मिलेगा? बस यहीं पर इक्विटी और DVR वाले शेयरों का दूसरा अंतर सामने आता है।

अपने वोटिंग के अधिकार के बदले में, कंपनी DVR वाले इक्विटी शेयरधारकों को साधारण इक्विटी शेयरधारकों से ऊँची दर पर डिविडेंड देती है। पर हाँ, सभी इक्विटी शेयर की तरह, इन शेयरों पर भी डिविडेंड कंपनी के मुनाफ़े पर निर्भर करता है।   

DVR वाले इक्विटी शेयर का एक फायदा और है कि आमतौर पर यह शेयर, स्टॉक एक्सचेंज पर इक्विटी शेयर की तुलना में कम कीमत पर कारोबार करते हैं।  इसलिए निवेशक और व्यापारी, उसी कीमत पर ज्यादा शेयर ले सकते हैं। उदाहरण के लिए, टाटा मोटर्स लिमिटेड के इक्विटी शेयर की शेयर बाज़ार में कीमत ₹105 है, जबकि इसी कंपनी के DVR वाले इक्विटी शेयर की कीमत ₹40 है। तो अब आप खुद देख सकते हैं कि दोनों प्रकार के शेयर्स की कीमत में कितना अंतर है।    

भारत में, टाटा मोटर्स लिमिटेड के अलावा, जैन इरिगेशन सिस्टम्स लिमिटेड एक और लोकप्रिय कंपनी है जिसने DVR वाले इक्विटी शेयर जारी किए हैं।

प्रेफरेंस शेयर

जैसा कि इसके नाम से ही पता चल रहा है, वरीयता या प्रेफरेंस शेयर वह शेयर होते हैं जिन्हें साधारण इक्विटी शेयर की तुलना में डिविडेंड भुगतान और रेसिडुअल क्लेम के मामले में प्रेफरेंस यानी प्राथमिकता मिलती है। यह ज़रूरी नहीं है कंपनियाँ प्रेफरेंस शेयर जारी करें, यह पूरी तरह से कंपनी के ऊपर निर्भर करता है। लेकिन, प्रेफरेंस शेयरधारकों को इक्विटी शेयरधारकों की तरह वोटिंग राइट नहीं मिलते है, इसके बदले में उन्हें एक निश्चित दर पर डिविडेंड मिलता है। और चाहे कंपनी मुनाफ़ा कमाए या नहीं, उसे इन शेयरधारक को डिविडेंड देना ही होगा।

इसके अलावा, लिक्विडेशन प्रकिया के दौरान, प्रेफरेंस शेयरधारकों को प्राथमिकता दी जाती है। जब कंपनी अपने प्रेफरेंस शेयरधारकों का सभी बकाया भुगतान कर देती है, तब ही कंपनी इक्विटी शेयरधारक को एसेट या पैसा वितरित कर सकती हैं।

8 विभिन्न प्रकार के प्रेफरेंस शेयर होते हैं  -

  • क्युमुलेटिव प्रफेरेंस शेयर
  • नॉन- क्युमुलेटिव प्रेफरेंस शेयर
  • पार्टिसिपेंटिंग प्रेफरेंस शेयर 
  • नॉन- पार्टिसिपेंटिंग प्रेफरेंस शेयर 
  • कनवर्टिबल प्रेफरेंस शेयर
  • नॉन-कनवर्टिबल प्रेफरेंस शेयर
  • रिडीमेबल प्रेफरेंस शेयर
  • नॉन-रिडीमेबल प्रेफरेंस शेयर

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रीटेल निवेशकों को सभी प्रकार के शेयरों के बारे में जानकारी क्यों होनी चाहिए?

अगर आप लंबे समय के लिए किसी कंपनी में निवेश करना चाह रहे हैं तो आपको उस कंपनी द्वारा जारी किए जाने वाले सभी प्रकार के शेयरों और श्रेणियों को जानना ज़रूरी है। ऐसा इसलिए क्योंकि शेयरों की यह अलग-अलग श्रेणियाँ हमारे जैसे निवेशकों को बहुत प्रभावित कर सकती हैं। चलिए, इसके बारे में और जानते हैं। 

जैसा कि हमने पहले ही इस अध्याय के एक सेक्शन में देखा,  अगर कोई कंपनी लिक्विडेशन की तरफ जाती है, तो प्रेफरेंस शेयरधारक को इक्विटी शेयरधारक से ज्यादा प्राथमिकता मिलती है। तो इसलिए आपके लिए जानना ज़रूरी हो जाता है की जिस कंपनी में आपने निवेश किया है या निवेश करने जा रहे है, उसने प्रेफरेंस शेयर जारी कर रखे हैं या नहीं। इस मूल्यांकन से आप कंपनी के लिक्विडेशन की परिस्थिति में आपको मिलने वाले रेसिडुअल क्लेम का बेहतर अनुमान लगा सकेंगे। 

इसके अलावा, चूंकि प्रेफरेंस शेयरधारक को डिविडेंड पाने के संबंध में भी प्राथमिकता मिलती है, इसलिए कंपनियां आमतौर पर अपने कमाए हुए मुनाफ़े में से उनका भुगतान पहले करती हैं। इसलिए जब कंपनी प्रेफरेंस शेयरधारक को निर्धारित डिविडेंड दे देती है, उसी के बाद वह कंपनी अपने इक्विटी शेयरधारक को डिविडेंड बांट सकती है। और अगर कंपनी के पास प्रेफरेंस शेयरहोल्डर के भुगतान के बाद मुनाफ़ा नहीं बचता है, तो उस साल इक्विटी शेयरधारकों को कोई डिविडेंड नहीं मिलेगा। या, अगर प्रेफरेंस शेयरधारक को भुगतान करने के बाद वितरण योग्य मुनाफ़ा बहुत कम बचा है, तो इक्विटी शेयरहोल्डर को डिविडेंड की कम दर के साथ संतुष्ट होना पड़ेगा। चूंकि यह सब एक रीटेल इन्वेस्टर के रूप में, इक्विटी शेयरधारकों की कमाई को काफी प्रभावित करता है, इसलिए यह ज़रूरी है कि आप ऐसे मुद्दों पर ध्यान दें।

अब, एक लंबी अवधि के रीटेल निवेशक के रूप में, आपका मुख्य ध्यान ज्यादा डिविडेंड कमाना होगा। तब, आप साधारण इक्विटी शेयरों के बजाय डिफ़्रेंशियल वोटिंग राइट्स वाले इक्विटी शेयरों में निवेश करने की सोच सकते हैं। हाँ, ऐसा करने से आपको कम वोटिंग राइट्स से संतुष्ट होना पड़ेगा, लेकिन आपको डिविडेंड ज्यादा मिलेगा और यही तो आप चाह रहे थे। इसलिए, यह देखना ज़रूरी हो जाता है कि आप जिस कंपनी में निवेश करना चाह रहे हैं, उसने साधारण इक्विटी शेयरों के अलावा कोई DVR जारी किया है या नहीं। इसके अलावा, DVR वाले इक्विटी शेयरों में निवेश करने से, आप ज्यादा शेयर खरीद सकते हैं, जिससे आपको मिलने वाले डिविडेंड में बढ़ोतरी हो सकती है।

अंत में, आपको उस कंपनी द्वारा जारी किए जाने वाले डाइल्यूटिव शेयरों की संख्या के बारे में भी ध्यान रखना चाहिए क्योंकि वे आपके EPS को प्रभावित कर सकते हैं। अगर किसी कंपनी ने ज़्यादा ESOP, स्टॉक वारंट या कनवर्टिबल ऋण उपकरणों जारी किए हैं, तो इनके धारकों द्वारा इन उपकरणों के इस्तेमाल से EPS कम हो सकता है। 

निष्कर्ष 

आजकल कंपनियाँ इक्विटी शेयर के अलावा शायद ही और कोई शेयर जारी करती हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि इक्विटी शेयर, शेयरधारक और निवेशकों के बीच बहुत लोकप्रिय हैं। इस अध्याय में बस इतना ही। अगले अध्याय में हम IPO में निवेश करने और IPO के लिए आवेदन करने के सभी तरीकों और उनकी प्रक्रिया को देखेंगे।

 अब तक आपने पढ़ा

  • भारत में पंजीकृत एक कंपनी दो प्राथमिक प्रकार के शेयर जारी करने के लिए अधिकृत है - इक्विटी शेयर और प्रेफरेंस शेयर।
  • साधारण शेयरों के तौर पर भी जाने जाने वाले, इक्विटी शेयर एक कंपनी में स्वामित्व का प्रतिनिधित्व करते हैं।
  • किसी कंपनी के इक्विटी शेयर के धारकों को आमतौर पर इक्विटी शेयरधारकों के रूप में संदर्भित किया जाता है।
  • इक्विटी शेयरों में मतदान के अधिकार होते हैं जो शेयरोंधारकों को कंपनी की जेनेरल मीटिंग में भाग लेने और व्यावसायिक निर्णयों पर मतदान करने की अनुमति देते हैं।
  • इक्विटी शेयरधारक डिविडेंड के हकदार हैं, जो अनिवार्य रूप से कंपनी द्वारा अर्जित मुनाफ़े का वितरण है।
  • साधारण इक्विटी शेयरों की तरह ही, डाइल्यूटिव शेयर सभी अधिकारों और फायदों का आनंद लेते हैं और किसी भी तरह से उनसे अलग नहीं होते हैं।
  • डिफरेंशियल वोटिंग राइट्स वाले इक्विटी शेयर सामान्य शेयरों के काफी समान होते हैं,  लेकिन उनके पास वोटिंग अधिकार कम होते हैं।
  • मतदान के अधिकार को छोड़ने के बदले में, कंपनी DVR वाले इक्विटी शेयरधारकों को, इक्विटी शेयरधारकों की तुलना में, ऊँची दर पर डिविडेंड देती है। 
  • स्टॉक एक्सचेंज पर सामान्य इक्विटी शेयरों की तुलना में DVR वाले इक्विटी शेयर कम मूल्य पर ट्रेड करते हैं।
  • प्रेफरेंस शेयर वे शेयर हैं जो साधारण इक्विटी की तुलना में डिविडेंड भुगतान और रेसिडुअल क्लेम के संबंध में उच्च प्राथमिकता रखते हैं।
  • प्रेफरेंस शेयरधारक किसी भी मतदान के अधिकार के हकदार नहीं हैं।
  • प्रेफरेंस शेयरधारक डिविडेंड की एक निश्चित दर का आनंद लेते हैं जिसका भुगतान करने के लिए कंपनी बाध्य है, चाहे वह मुनाफ़ा कमाए या नहीं।
  • विभिन्न प्रकार के प्रेफरेंस शेयर हैं:
    1. क्युमुलेटिव प्रेफरेंस शेयर
    2. नॉन- क्युमुलेटिव प्रेफरेंस शेयर
    3. पार्टिसिपेंटिंग प्रेफरेंस शेयर 
    4. नॉन- पार्टिसिपेंटिंग प्रेफरेंस शेयर 
    5. कनवर्टिबल प्रेफरेंस शेयर
    6. नॉन-कनवर्टिबल प्रेफरेंस शेयर
    7. रिडीमेबल प्रेफरेंस शेयर
    8. नॉन-रिडीमेबल प्रेफरेंस शेयर
  •  अगर कोई कंपनी लिक्विडेशन की ओर बढ़ती है, तो इक्विटी शेयरधारकों की तुलना में प्रेफरेंस शेयरधारकों को अधिक प्राथमिकता मिलती है।
  • इसके अलावा, चूंकि प्रेफरेंस शेयरधारकों को डिविडेंड के संबंध में उच्च प्राथमिकता पाते हैं, इसलिए कंपनियां आमतौर पर अर्जित लाभ से उनका भुगतान पहले करती हैं। 
  •  अगर कंपनी के पास अपने प्रेफरेंस शेयरधारकों को भुगतान करने के बाद वितरण योग्य मुनाफ़ा नहीं बचता, तो इक्विटी शेयरधारकों को उस विशेष अवधि के लिए कोई डिविडेंड नहीं मिलेगा।
  • अगर किसी कंपनी ने ESOP, स्टॉक वारंट या कनवर्टिबल ऋण उपकरणों की एक उच्च संख्या जारी की है, तो इनके धारकों द्वारा इन उपकरणों के इस्तेमाल से EPS कम हो सकता है।
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