वोडाफोन-आइडिया: क्या गड़बड़ हुई?

01 Apr, 2021

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अधिग्रहण और विलय शेयर बाज़ार के निवेशकों को उस संभावित गतिविधि की ओर आकर्षित करते हैं जो भविष्य में उन कंपनियों में बड़े पैमाने पर हो सकती हैं। पिछले कुछ सालों में कई सफल विलय हुए हैं और उद्योग के एक खंड में नेतृत्व का मतलब बदल दिया है। उल्लेखनीय मिसाल हैं एक्सॉन मोबिल, डिज्नी एवं पिक्सर और एओएल एवं टाइम वॉर्नर। लेकिन विलय घाटे का भी हो सकता है - और वोडाफोन आइडिया का विलय अब तक दुसरे खंड में रहा है। सो क्या गड़बड़ हुई? चलिए पता लगाते हैं!

वोडाफोन और आईडिया भारतीय दूरसंचार उद्योग की दो सबसे मज़बूत कंपनियां रही हैं। 2016 तक वोडाफोन और आईडिया दरअसल, अपने उपभोक्ताओं की संख्या के लिहाज़ से सबसे बड़ी दूरसंचार कंपनियां रहीं जो सिर्फ एयरटेल से ही पीछे थीं जिसके पास उस समय 24 प्रतिशत से अधिक हिस्सेदारी थी। साल 2018 में विलय के बाद वोडाफोन-आईडिया ने बाज़ार हिस्सेदारी के लिहाज़ से नेतृत्व किया और 38 प्रतिशत से अधिक उपभोक्ताओं पर काबिज़ हो गई। हालाँकि, रिलायंस के नेतृत्व वाले ब्रांड जियो के प्रवेश के बाद चीज़ें बिल्कुल बदल गईं। रिलायंस जियो अब 35 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ बाज़ार का नेतृत्व कर रहा है जिसके बाद 29 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ एयरटेल का स्थान और वोडाफोन-आईडिया के पास सिर्फ 25 प्रतिशत हिस्सेदारी है। 

दो साल की अवधि में वोडाफोन-आईडिया ने 13 करोड़ से ज़्यादा उपभोक्ता खोये और यह बदलाव भारत में 4जी स्पेक्ट्रम और तेज़ कनेक्टिविटी पेश होने की साथ-साथ हुआ। हालांकि पृष्ठभूमि में जो हुआ वह इतना सामान्य रहा है। दरअसल दूरसंचार उद्योग में इस भारी बदलाव का श्रेय दूरसंचार उद्योग को जो चीज़ें प्रत्स्पर्धात्मक लाभ पहुंचाते हैं उनके अलावा ठीक से अनुसंधान किये गए बिजनेस मॉडल को दिया सकता है। 

जब रिलायंस-जियो ने दूरसंचार उद्योग में प्रवेश किया तो यह वॉयस ओवर एलटीई टेक्नोलॉजी लाने वाली पहली कंपनी थी जो दूसरों को वॉयस कॉल करने में या इसकी गुणवत्ता बढ़ाने के लिए इन्टरनेट कनेक्टिविटी का लाभ उठाती है। सामने यह दिखा कि इस टेक्नोलॉजी ने वॉयस कनेक्टिविटी बेहतर की और 4जी का मतलब था मोबाइल उपकरणों पर सुपर-फ़ास्ट कनेक्शन। लेकिन परदे की पीछे, इस टेक्नोलॉजी ने रिलायंस-जियो को एक एकीकृत योजना लाने में मदद की जिसमें उपभोक्ताओं को देश भर में किसी भी नेटवर्क पर मुफ्त अनलिमिटेड कॉल करने की सुविधा मिली। वोडाफोन-आईडिया को बाज़ार में वीओएलटीई और 4जी लाने में काफी समय लगा और इस प्रक्रिया में इसने काफी संख्या में अपने उपभोक्ता खो दिए जो रिलायंस-जियो चले गए। 

अब, हम सब जानते हैं कि नंबर पोर्टेबिलिटी पेश होने के बावजूद टेलिकॉम प्रोवाइडर बदलना कितना मुश्किल है। ये कोई नहीं करना चाहता। लेकिन जब जियो ने बाज़ार में कदम रखा तो बस तीन साल में इसने 33 प्रतिशत से अधिक उपभोक्ताओं पर कब्ज़ा कर लिया। इस दौर कीमत की प्रतिस्पर्धा का रहा जबकि हर सर्विस प्रोवाइडर हरसंभव सबसे कम कीमत पर प्लान देने की होड़ में था। इसी दौरान वोडाफोन आईडिया के पास भारी कमी रही, नकदी भंडार की जो जियो ने पेश की (रिलायंस की कंपनी होने के नाते) और उद्योग की सबसे तेज़ कनेक्टिविटी स्पीड की जो एयरटेल के पास थी। 

हालाँकि, बात इतनी ही नहीं थी। भारतीय टेलिकॉम बाज़ार बदनाम किस्म की प्रतिस्पर्धा और बेहद कम मार्जिन के लिए जाना जाता रहा है जो आपके उपभोक्ताओं की संख्या के लिए बनाया जा सकता है। दरअसल, वोडाफोन-आईडिया के लिए प्रति उपयोक्ता औसत आय (एआरपीयू) 108 रूपये से थोड़ी अधिक है जो पहले 108 रूपये थी जबकि जियो और एयरटेल का एआरपीयू क्रमशः 124 रूपये और 129 रही - इसका श्रेय सस्टेनेबल प्रतिस्पर्धा और कारोबार के दक्ष तौर-तरीकों को जाता है, पर्दे के पीछे जिसके ज़रिये विशाल परिचालन होता है। 

संकट कितना गहरा है, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है। साल 2018 के मध्य में जब विलय हुआ, वोडाफोन-आईडिया 50-70 रूपये के मूल्य दायरे में कारोबार कर रहा था। इसके अगले साथ, हालांकि, कीमत गिरकर 10 रूपये से नीचे चली आई और एक मौके पर वीआई 3.4 रूपये प्रति शेयर पर कारोबार कर रही थी और यदि सिर्फ कीमत पर नज़र डालें तो यह एकदम चवन्नी स्टॉक के दायरे में आता। हालांकि, दूसरी वजहें थी जिनके कारण कीमत इतनी गिर गई। इस गिरावट के लिए अपर्याप्त नकदी प्रवाह को ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है जो पिछले कुछ साल से कंपनी के बैलेंस शीट पर दबाव बना रही थी। इस लेख को लिखने के समय वीआई का शेयर 10 रूपये पर कारोबार कर रहा था। 

फिलहाल, वीआई पर सरकार भारी-भरकम क़र्ज़ बकाया है - साफ़-साफ़ कहें तो वीआई अब इस सवाल पर सर्वोच्च न्यायालय में हारी हुई लड़ाई लड़ रहा है कि समायोजित सकल आय (एडजस्टेड ग्रॉस रेवेन्यू) का क्या मतलब है। यह मामला नियामकीय बकाए से भी जुड़ा है। किसी समय कंपनी पर सरकार का 44,000 करोड़ रुपये बकाया था - जिसके कारण इसकी क्रेडिट रेटिंग में भी भारी गिरावट आई। हाल में, कंपनी ने अपने बकाए पर दो साल की मोहलत मांगी है, जबकि सरकार ने थर्ड पार्टी ऑडिटर्स का लाभ उठाने की योजना बनाई है ताकि उस राशि पर सहमति बनाई जा सके जिसका भुगतान कंपनी को करना- दरअसल, बकाया इतना अधिक है कि वीआई की विफलता भारतीय वित्तीय प्रणाली और भारत के खस्ताहाल राजकोषीय घाटे को प्रभावित करने के लिए काफी हो सकती है। 

संक्षेप में, वोडाफोन और आइडिया दोनों ने जियो के प्रवेश और इसके कारोबार के क्रांतिकारी तौर-तरीकों का मुकाबला करने के लिए हाथ मिलाया था। जियो ने टेलिकॉम क्षेत्र में दक्ष परिचालन और मुनाफेदारी को नयी परिभाषा दी। हालांकि, दोनों कंपनियां बाज़ार में प्रतिस्पर्धी टेक्नोलॉजी और योजनाएँ पेश करने में नाकाम रहीं कि वे बदहाली से बच सकें। जियो की मज़बूत वित्तीय स्थिति और भारती एयरटेल के बेहतरीन कनेक्टिविटी और स्पीड प्रदान पर ध्यान केंद्रित करने से वीई ऐसे उद्योग में प्रतिस्पर्धा में पिछड़ गया जहाँ परिचालन लागत ऊंची है और आय का मार्जिन बहुत कम है। इन सारी परेशानी में थोड़े कानूनी पचड़े भी मिला दें और परिणाम यह हुआ कि भारत की तीसरी सबसे बड़ी टेलिकॉम कंपनी के शेयर की कीमत में 94 प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज़ हुई। भारत में वीआई की वापसी की कोई गुंजाइश है? सिर्फ समय ही बताएगा! 

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