ब्लू इकॉनमिक पालिसी पर एक नज़र

26 Mar, 2021

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आपने ख़बरों में ब्लू इकॉनमिक पालिसी के बारे में सुना होगा। आपने कभी सोचा  है कि ये क्या है, और इसका भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) पर क्या असर होता और आने वाले दिनों में ब्लू इकॉनमिक पालिसी भारत की जीडीपी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले तत्वों को कैसे प्रभावित करेगी? और सबसे महत्वपूर्ण यह कि यह ब्लू इकॉनमी है क्या? इस लेख में हम एकदम इसी पर विचार कर रहे हैं। सो अभी पता लगाते हैं।

दूसरे जवाब की तलाश पहले करते हैं। ब्लू इकॉनमी की अवधारणा क्या है? मूल रूप से, द कॉमनवेल्थ के मुताबिक़ ब्लू इकॉनमी ऐसी अवधारणा है जो कुछ साबसे बड़े सम्बद्ध पक्ष को ज़िम्मेदार तरीके से सामुद्रिक आर्थिक गतिविधियों के बारे में सोचने के लिए प्रोत्साहित करता है। और हम ऐसा क्यों करना चाहते हैं? पहली बात यह कि समुद्र की सीमित सीमा नहीं है हालांकि विभिन्न देश इन पर अपना अधिकार जताते हैं और सैटेलाईट इमेजिंग के ज़रिये अपना क्षेत्राधिकार तय करते हैं। अब यदि भारत बंगाल की खाड़ी में परमाणु कचरा बहाने लगता है तो प्रदूषण आस-पास के क्षेत्रों को प्रभावित करेगा और यदि बड़े पैमाने पर होता है सो हम विश्व भर में होने वाले इसके पूरे असर या पानी के अन्दर की पारिस्थितिकी पर पड़ने वाले प्रभाव के बारे में बात कर रहे हैं। दरसल ब्लू इकॉनमी की अवधारणा सीधे-सीधे संयुक्त राष्ट्र के सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल (एसडीजी) नंबर 14 से जुडी है जो जलीय जीवन पर ध्यान केन्द्रित करता है।

 इसके अलावा, वैश्विक सस्टेनेबिलिटी से जुड़े सबसे बड़े मुद्दे समुद्र  से जुड़े हैं - जैसे कॉरल रीफ विलुप्त हो रही हैं, जल प्रदूषण, समुद्र का जल-स्तर बढ़ रहा है, और जलीय जीवन गायब हो रहा है।  ब्लू इकॉनमी की अवधारणा इस तरह महासागरों में और उसके आस-पास होने वाली आर्थिक गतिविधियों के इर्द-गिर्द स्थायी विकास की जिम्मेदारी का संकेत देती है। आपको पता ही होगा कि मानव जीवन किस तरह अनिवार्य रूप से समुद्र से जुड़ा हुआ है - तटीय क्षेत्रों के आसपास रहने वाली आबादी और मछली पकड़ने, प्राकृतिक संसाधन के दोहन , लॉजिस्टिक्स (बंदरगाह पर), पर्यटन, आदि जैसी आर्थिक गतिविधियों के बारे में। भारत के मामले में, ब्लू इकनॉमिक पॉलिसी का विशेष मतलब है। आपको पता है क्यों? पहली बात कि नीति बनाने के संभावित असर के पैमाने पर विचार करते हैं जिससे भारत में समुद्रों के आस-पास सस्टेनेबल आर्थिक गतिविधि को प्रोत्साहन मिलेगा। यहाँ एक महत्वपूर्ण बात है कि भारत एक प्रायद्वीप है जिसका तटीय क्षेत्र 7500 किलोमीटर है और भारत के नौ राज्य समुद्र तट पर स्थिति हैं। इसके अलावा भारत में 199 बंदरगाह हैं जिनमें से प्रमुख 12 सालाना 140 करोड़ टन माल ढुलाई का बोझ उठाते हैं। साथ ही 40 लाख से अधिक लोग मछली पकड़ने जैसी गतिविधियों पर निर्भर करते हैं - और मत्स्य पालन विश्व भर में सबसे तेज़ी से वृद्धि दर्ज़ करने वाला उद्योग है। 

यदि संसाधनों इस्तेमाल सही तरीके से किया जाए तो भारत को अपने समुद्रों के आसपास अर्थव्यवस्था को मज़बूत करने से बेहद फायदा होगा। यहीं ब्लू इकॉनोमिक नीति आती है- पॉलिसी का पहला ड्राफ्ट भारत के झंडे के नीले चक्र का दायरा बढ़ाने के साथ शुरू होता है जो इस बात का संकेत है भारत में ब्लू इकॉनमी का स्थान कितना महत्वपूर्ण है। हालांकि, नीति एक बात पर केन्द्रित है कि ब्लू इकॉनमी कैसे भारत के जीडीपी को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है और इसमें सामुद्रिक सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा और समावेशी विकास जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों को सस्टेनेबिलिटी से अलग नहीं रखा गया है।

 नीति में ऐसा एजेंडा बनाने पर जोर दिया गया है जो भविष्यपरक हो, और ज़िम्मेदार गवर्नेंस के ढांचे के ज़रिये राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर बहुक्षेत्रीय और अंतर-आयामीय प्रभाव पैदा करने के लिए विज्ञान एवं प्रोद्योगिकी में हुई ताज़ातरीन प्रगति को शामिल किया गया हो। इस नीति में ब्लू इकॉनमी के मौजूदा वैश्विक परिदृश्य को संदर्भ बिंदु के तौर पर लेकर वर्तमान नियमन और बेंचमार्क से जुड़े कार्रवाई योग्य सिफारिशों पर भी विचार किया गया है। 
इसके अलावा, इसमें ऐसे अध्ययन शुरू करने की सिफारिश की गई है जो विभिन्न क्षेत्रों में निवेश के गहन प्रभाव मूल्यांकन पेश करेंगे कि ये ब्लू इकॉनमी और पूरी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को कैसे प्रभावित करेंगे। साथ ही यह इस तरह के अध्ययनों को इन अनुमानों में पर्यावरणीय प्रभाव को शामिल करने की भी सिफारिश की गई है - यह विशेष रूप से बुनियादी ढांचे और विनिर्माण गहन गतिविधियों के मामले में सही है जो अंततः ब्लू इकॉनमी को बढ़ावा देगा। ऐसा इसलिए भी कि इन गतिविधियों से कार्बन फुटप्रिंट बढ़ता है, और सस्टेनेबिलिटी इस पर निर्भर करती है कि ऐसे तौर-तरीके अपनाए जाएँ जो उच्च लागत पर पर्यावरण पर पड़ने वाले असर की भरपाई करें।

  नीति के मसौदे में पर्यटन और स्थानिक (स्पाशियल) योजना को भी नहीं छोड़ा गया है। हममें से जो समुद्र तटों पर गए हैं, हमने प्रदूषण के बारे में निश्चित रूप से शिकायत की है या इस पर गौर किया है कि यह प्राकृतिक सौंदर्य के आनंद को कैसे ख़त्म करता है। स्पाशियल योजना को पर्यटन से होने वाले लाभ से जुड़ी होगी, जो क्षेत्रीय अर्थव्यवस्थाओं को भी प्रोत्साहन देगी। सामुद्रिक इलाके से कचरा हटाने की एक गहन नीति के ज़रिये समुद्र तट और समुद्र से प्लास्टिक के कचरे को दूर करना एक अन्य प्रमुख क्षेत्र होगा।

 मेरीकल्चर(सामुद्रिक कृषि) के मामले में, नीति में सुझाव दिया गया है कि कम कार्बन फुटप्रिंट वाले तौर-तरीके अपनाने के लिए अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से साथ गठजोड़ किया जाए जिसका अंतिम लक्ष्य हो इन गतिविधियों से उत्पादन बढ़ाना। इसके अलावा, इस मसौदे में उन्नत इमेजिंग और सेंसिंग प्रौद्योगिकियों को अपनाने की ज़रुरत पर भी रोशनी डाली गई है, जो सामुद्रिक स्थिति की निगरानी कर सकते हैं, और कैसे ऐसी प्रोद्योगिकी संवेदनशील सामुद्रिक पारिस्थितिकी प्रणालियों, मसलन कॉरल रीफ और अन्य जलीय जीवन को संरक्षित करने के लिए महत्वपूर्ण होंगी जो समुद्र में मानवीय/आर्थिक गतिविधियों से प्रभावित हैं। 
आखिर में, ये लक्ष्य सामुद्रिक सहयोग पर अंतरराष्ट्रीय नियमन के अनुरूप हासिल किये जाने चाहिए, और सामुद्रिक सुरक्षा इसेमिन बड़ी भूमिका निभाएगी कि भारत में वैश्विक तौर-तरीकों के अनुरूप भारत की ब्लू इकॉनमी कैसे आकार लेगी। ब्लू इकनॉमिक पॉलिसी आने वाले दिनों में भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए दिशा कैसे तय करेगी, इसका मूल्यांकन करना मुश्किल है, इसलिए भी कि इन सिफारिशों पर अब तक एजेंडे के जरिए अमल में लाना बाकी है जो चीजों को गति देगा। हालांकि, भारत की ब्लू इकनॉमिक नीति सस्टेनेबल विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, और प्रधानमंत्री के इन सिफारिशों पर अमल के संकल्प के मद्देनज़र यह नीति तटीय क्षेत्रों में गतिविधियाँ तेज़ी से बढ़ा सकती है।

 नीति के स्तर पर की गई सिफारिशें अर्थव्यवस्था और बाज़ार को कैसे प्रभावित करती हैं इसके बारे में क्या जानना चाहते हैं? तो अब लॉग इन करें हमारी वेबसाईट www.angelbroking.com ज़्यादा जानने के लिए!

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